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सुलगता कश्मीर

Posted On: 19 Sep, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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अलगाववादी तत्वों के कारण कश्मीर घाटी एक बार फिर हिंसा की आग में जल रही है। यहां जून के महीने से पत्थरबाजी का जो दौर शुरू हुआ वह हर दिन तेज होता गया। उमर अब्दुल्ला सरकार न तो पत्थरबाजी के इस सिलसिले को रोक सकी और न ही उन तत्वों को जिन्होंने हिंसा के उस दुष्चक्र को रचा जिसके तहत उग्र भीड़ सुरक्षा बलों पर हमला करती और जब उनकी ओर से गोलीबारी होती तो लोग मरते या फिर घायल होते। इसके जवाब में अगले दिन भीड़ और उग्र रूप धारण कर लेती। हिंसा के इस दुष्चक्र के चलते तीन माह में कश्मीर घाटी में करीब 70 लोग मारे गए। ईद के दिन भारत सरकार के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन तो उग्र थे ही, दो दिन बाद इस अफवाह ने घाटी में फिर आग लगा दी कि अमेरिका में कुरान का निरादर किया गया है। देखते ही देखते सरकार और अमेरिका विरोध ने पूरी घाटी को अपनी चपेट में ले लिया। हिंसा पर उतारू भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश में सुरक्षा बलों के हाथों करीब 20 लोग मारे गए। इस बार भी हमेशा की तरह मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला मदद के लिए दिल्ली आए और केंद्र सरकार भी नींद से जागी और सक्रियता दिखाते हुए प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक बुलाने का निर्णय लिया। इस बैठक में कश्मीर को दिए जाने वाले पैकेज और सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून में कटौती पर तो कोई आमराय नहीं बनी, लेकिन कश्मीर के मुख्य विपक्षी दल पीडीपी ने उमर सरकार को नाकाम बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस बैठक के बाद उमर अब्दुल्ला की नेतृत्व क्षमता पर उठ रहे सवाल तो और धारदार हुए ही, उन्हें हटाए जाने की अटकलें भी शुरू हो गईं। इन अटकलों पर यकायक विराम तब लगा जब पश्चिम बंगाल के दौरे पर गए राहुल गांधी ने यह कहा कि उमर को और समय तथा समर्थन देने की आवश्यकता है। यद्यपि उन्होंने घाटी जाने और वहां की समस्या पर ध्यान देने से यह कहकर मना कर दिया कि वह एक समय में एक ही काम करते हैं, लेकिन उनका बयान उमर अब्दुल्ला को फिलहाल राहत देने वाला रहा।


इसमें संदेह नहीं कि केंद्र के साथ-साथ गाधी परिवार भी उमर अब्दुल्ला के साथ है। वैसे भी उमर अब्दुल्ला एक गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं, जो कांग्रेस के सहयोग से चल रही है। ऐसे में राजनीतिक रूप से यह सही नहीं रहेगा कि केंद्र सरकार उमर अब्दुल्ला सरकार के विरुद्ध दिखे। शायद इसीलिए घाटी में इतनी हिसा के बावजूद भी उमर अब्दुल्ला अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे, पर दुर्भाग्य यह है कि उन्होंने जब से सत्ता संभाली है तभी से कश्मीर घाटी के लोगों के प्रति वह अपनत्व नहीं दिखा सके जिसकी अपेक्षा की जा रही थी। वह ईद के मुबारक मौके पर हजरत बल की मस्जिद में नमाज पढ़ने भी नहीं गए, जबकि इस दिन मुख्यमंत्री का वहां जाना एक परंपरा का रूप ले चुका है।


वर्तमान में अलगाववादी तत्वों के इशारे पर सड़कों पर उतरने वाले पत्थरबाजों और आम कश्मीरी युवाओं के बीच भेद करना कठिन है। वहां के युवा सुरक्षाबलों के सामने सीना तान कर खड़े हो रहे हैं। उनके उग्र रूप को देखते हुए यह कहना कठिन है कि कश्मीर घाटी को कोई राहत पैकेज देकर शांत-संतुष्ट किया जा सकता है। घाटी में जैसी स्थितियां हैं उन्हें देखते हुए तो यह लगता है कि वहां के युवाओं को अब गिलानी और मीरवाइज जैसे नेताओं की जरूरत भी नहीं रह गई है। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि सीमा पार के जो संगठन अभी तक घाटी के अलगाववादी नेताओं के जरिये अपना खेल खेल रहे थे उन्होंने अब युवाओं के बीच अपनी जड़ें जमा ली हैं। लिहाजा गिलानी और मीरवाइज जैसे अलगाववादी नेता अब महज घाटी के आक्रोश का फायदा ही उठा रहे है।


प्रधानमंत्री के कहने पर जो सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल सोमवार को जम्मू-कश्मीर जा रहा है उसकी पूरी कोशिश होगी कि वह हुर्रियत के नरम-गरम धड़ों या अन्य राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से मुलाकात कर सके, लेकिन इस मुलाकात का शायद ही कहीं कोई सकारात्मक परिणाम निकले। यह प्रतिनिधिमंडल चाह कर भी उन लोगों तक पहुचने में नाकाम रहेगा जो कश्मीरी युवकों को भड़काकर पत्थरबाजी करवा रहे है। कश्मीर घाटी के हालात इतने गंभीर होने के पीछे जम्मू-कश्मीर पुलिस की नाकामी भी सामने आ रही है, क्योंकि वह हिंसक भीड़ के प्रति पर्याप्त सख्ती नहीं दिखा पा रही। जब भी हालात बिगड़ते हैं, पुलिस सीआरपीएफ को आगे कर देती है और जब उसकी गोलियों से लोग मारे जाते हैं तो घाटी में भारत विरोधी माहौल और अधिक उग्र हो जाता है। उमर अब्दुल्ला का मानना है कि सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून में अगर कटौती कर दी जाए अथवा उसको हटा दिया जाए तो इससे हालत को सुधारने में मदद मिलेगी, पर उनकी यह माग उनकी अपनी नाकामी को ढकने की एक कोशिश मात्र है। आज यह सबको पता है कि यह विशेषाधिकार कानून सेना के लिए है, जबकि भीड़ को नियंत्रित करने का काम इस समय जम्मू-कश्मीर पुलिस या सीआरपीएफ करते है, जिन पर यह कानून लागू ही नहीं होता। शायद इस बात को भाप कर और सेना को इस पचड़े में खींचने के लिए ही गिलानी ने लोगों से यह मूर्खतापूर्ण अपील की है कि वह सेना के कैंप के आगे धरना-प्रदर्शन करें, जिससे फिर कहीं कोई अनहोनी हो जाए। वैसे भी सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने यह साफ कर दिया है कि मौजूदा स्थितियों में इस कानून में कटौती नहीं की जानी चाहिए। अनेक राजनीतिक दल भी इसी मत के हैं। खुद सरकार के अंदर इस कानून में कटौती को लेकर मतभेद उभर आए हैं। हो सकता है कि जब सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल कश्मीर जाए तब इस कानून में कटौती का सवाल फिर से उठे। घाटी में आज की खराब स्थिति के लिए राज्य सरकार और वहां के अन्य राजनीतिक दल ही अधिक जिम्मेदार हैं। सत्तारूढ़ नेशनल कांफ्रेंस समेत अन्य दलों ने घाटी में जो राजनीतिक शून्य पैदा किया उसे अलगाववादियों ने अपनी सक्रियता से भर दिया, जिनके ऊपर कई मायनों में हुर्रियत का भी जोर नहीं चलता। ये सारे संगठन सीमा पार से मदद ले रहे हैं।


उमर की बार-बार दिल्ली की दौड़ के कारण उनका अपना मंत्रिमंडल और प्रशासन उनके साथ वह अपनत्व का रिश्ता नहीं जोड़ पा रहा है जो आवश्यक है। ऐसे में उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवालिया निशान लग गया है। यह निराशाजनक है कि हिसा ग्रस्त घाटी को जिस मरहम की जरूरत अपने मुख्यमंत्री से थी वह उसे नहीं मिला। आश्चर्य तो यह भी है कि मुख्य विपक्षी दल पीडीपी भी आहत लोगों के साथ जुड़ नहीं पा रही है। अब जब यह बात स्पष्ट है कि राजनीतिक शून्यता के कारण ही घाटी की यह स्थिति हुई है तब केंद्र का उमर अब्दुल्ला के प्रति नरमी दिखाना चकित करता है। शायद इस नरमी का कारण यह है कि अगर मौजूदा समय में उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया तो उनका राजनीतिक करियर हाशिये पर जा सकता है, लेकिन केंद्र सरकार को उनके हित से अधिक महत्ता राष्ट्र को देनी चाहिए।


केंद्र सरकार को यह ध्यान में रखना होगा कि कश्मीर के हालात भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित करने वाले हैं। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मंचों पर ऐसे अनेक अवसर आए हैं जब पाकिस्तान कश्मीर का सहारा लेकर अपना पलड़ा भारी करने में सक्षम रहा और भारत को बचाव की मुद्रा अपनानी पड़ी। पाकिस्तान एक बार फिर कश्मीर मुद्दा उछालने की कोशिश में है। भारत को विशेष सावधानी बरतनी होगी-इसलिए और भी अधिक, क्योंकि डेढ़ माह बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा दिल्ली आ रहे हैं। यदि उस समय तक घाटी के हालात नहीं सुधरते तो अमेरिका की ओर से ऐसा कोई बयान आ सकता है जिससे भारत को शर्मसार होना पड़े।


Source: Jagran Nazariya




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