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सरकार और समन्वय

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पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता के नेताओं में समन्वय की जैसी कमी दिख रही है वैसी इसके पहले कभी नहीं दिखी। कांग्रेस और सरकार के प्रतिनिधि ही नहीं, केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य भी महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी असहमति खुले आम दर्ज करा रहे हैं। इसे रोकने के लिए कांग्रेस ने अपने नेताओं को यह निर्देश जारी किया है कि वे बयानबाजी करने से बचें और उन्हीं मामलों में टिप्पणियां करें जिन्हें वे स्वयं देख रहे हैं। इन निर्देशों से यह स्पष्ट है कि कांग्रेस नेतृत्व अपने नेताओं की आपसी छींटाकशी से असहज है। यह बात और है कि इन निर्देशों का पालन होता नहीं दिख रहा है। पिछले दिनों नक्सलवाद को लेकर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह और गृहमंत्री चिदंबरम ने जिस तरह नए सिरे से एक-दूसरे पर प्रहार किया उसे अभूतपूर्व ही कहा जाएगा। ऐसा बहुत कम होता है जब पार्टी के वरिष्ठ नेता अपने ही केंद्रीय मंत्री की खुलेआम आलोचना करें और उसे जायज भी ठहराएं।

नक्सलियों पर नियंत्रण पाना एक जटिल और चुनौती भरा काम है। नक्सलियों ने जिस तरह ग्रामीण इलाकों में घुसपैठ कर ली है और अपने समर्थक खड़े कर लिए हैं उसके कारण कांग्रेस ही नहीं, अन्य दलों के नेता भी इसके पक्ष में नहीं कि उनके खिलाफ बल प्रयोग किया जाए और विशेष रूप से सेना का सहयोग लिया जाए। इसके विपरीत चिदंबरम चाहते हैं कि आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुके नक्सलियों के खिलाफ नरमी न बरती जाए और उन्हें काबू में करने के लिए सेना का सीमित उपयोग किया जाए। इसमें दो राय नहींकि इस पर बहस होनी चाहिए कि नक्सली समस्या को किस तरह से सुलझाया जाए, लेकिन बहस के नाम पर दिग्विजय सिंह ने जिस तरह चिदंबरम के दृष्टिकोण के खिलाफ न केवल एक लेख लिखा, बल्कि उन्हें बौद्धिक रूप से अहंकारी भी करार दिया उससे यह स्पष्ट है कि नक्सलियों के प्रति जो रणनीति अपनाई जानी चाहिए उसमें हद से ज्यादा विरोधाभास है। इस विरोधाभास का लाभ तो नक्सली उठाएंगे ही, साथ ही काग्रेस और केंद्र सरकार की खिल्ली भी उड़ेगी। जिस तरह नक्सलवाद को लेकर दिग्विजय सिंह और चिदंबरम आमने-सामने खड़े हुए उसी तरह भूतल परिवहन मंत्री कमलनाथ और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा किया। यही नहीं कमलनाथ ने योजना आयोग को भी आड़े हाथों लिया, जिसका जवाब मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने उन्हीं की भाषा में दिया। यह भी साफ नजर आ रहा है कि न केवल जयराम रमेश की नीतियों से असहमत होने वाले मंत्रालयों की संख्या बढ़ती जा रही है, बल्कि उनकी आलोचना का सिलसिला भी तेज हो रहा है। जयराम रमेश के कामकाज से कमलनाथ ही नहीं, कोयला, नागरिक उड्डयन और ऊर्जा मंत्री भी अप्रसन्न नजर आ रहे हैं। इन मंत्रालयों की आपत्ति यह है कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की सुस्त रफ्तार के कारण परियोजनाएं आगे नहींबढ़ पा रही हैं।

अभी तक जयराम रमेश का मंत्रालय अन्य मंत्रालयों पर निशाना साध रहा था, लेकिन अब योजना आयोग ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की सुस्ती पर सवाल उठाए। इस सबको देखते हुए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इस सरकार में समन्वय कहां पर है? हाल ही में गृहमंत्रालय और विदेश मंत्रालय में तब मतभेद उभर आए जब विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा की पाकिस्तान यात्रा के ठीक पहले गृह सचिव जीके पिल्लै ने यह कह दिया कि मुंबई हमले के पीछे आईएसआई का हाथ था। कृष्णा ने इस्लामाबाद से लौट कर पिल्लै के बयान की आलोचना की। इसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी पिल्लै के बयान से असहमति जताई। अब विदेश और गृहमंत्रालय अपने मतभेद दूर करने में जुटे हैं, लेकिन दोनों के बीच तनातनी से सरकार की जो किरकिरी होनी थी वह तो हो ही गई। इससे साफ पता चलता है कि सरकार में किस हद तक समन्वय की कमी है। क्या यह अच्छा नहीं होता कि खुलेआम एक-दूसरे की आलोचना करने के बजाय दोनों मंत्रालयों के अधिकारी आपस में बैठकर अपने मतभेद दूर कर लेते? चूंकि ऐसा नहीं किया गया इसलिए देश और दुनिया को यह संदेश गया कि पाकिस्तान संबंधी नीति को लेकर भारत सरकार के दो मंत्रालयों में गहरे मतभेद हैं। पाकिस्तान को लेकर विदेश और गृहमंत्रालय के बीच के मतभेद जिस तरह सार्वजनिक हुए उससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की किरकिरी तो हुई ही, इस्लामाबाद में कूटनीतिक शिष्टाचार को ताक पर रखने वाले पाकिस्तानी विदेश मंत्री को खुद को सही ठहराने का अवसर भी मिला।

विभिन्न मसलों पर केंद्र सरकार के आपसी मतभेद जिस तरह सार्वजनिक हुए हैं उससे संसद के मानसून सत्र के लिए विपक्ष को सत्तापक्ष के खिलाफ ऐसे मुद्दे हाथ लग गए है जिनसे सरकार की किरकिरी होना तय है। इस किरकिरी से बचने के लिए काग्रेस ने गुजरात के गृहमंत्री अमित शाह की फरारी को मुद्दा बनाने की तैयारी तो कर ली है, लेकिन इससे संसद में टकराव के आसार भी बढ़ गए हैं।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में पार्टी अथवा सरकार के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद उभरना कोई अनोखी बात नहीं, लेकिन यह तो विचित्र है कि मतभेद एक तरह के झगड़े में तब्दील हो जाएं। अगर समस्याओं का समाधान करना है तो एक-दूसरे को गलत ठहराने के बजाय आम सहमति कायम करनी होगी। इस प्रक्रिया में जो मतभेद उभरें उन्हें सार्वजनिक होने से भी रोकना होगा, क्योंकि ऐसा न होने पर आम जनता को यह संदेश जाता है कि सरकार तय नहीं कर पा रही कि समस्या विशेष का समाधान कैसे किया जाए? आंतरिक लोकतंत्र का यह मतलब नहीं कि एक-दूसरे को सार्वजनिक रूप से कठघरे में खड़ा किया जाए और वैसे आरोप लगाए जाएं जैसे विपक्षी नेता लगाते हैं। वर्तमान में कांग्रेस और सरकार के प्रतिनिधियों में मतभिन्न्ता के नाम पर जो कुछ हो रहा है वह अनुशासनहीनता के अलावा और कुछ नहीं। इस अनुशासनहीनता के सार्वजनिक प्रदर्शन से सरकार की भद्द पिट रही है। सार्वजनिक स्तर पर होने वाली बयानबाजी से यह स्पष्ट होता है कि नीतिगत निर्णयों पर पार्टी और सरकार में खुलकर चर्चा नहीं होती। शायद यही कारण है कि खुद काग्रेसजन सरकार के निर्णयों पर अपनी असहमति से मीडिया को अवगत कराते हैं। जब ऐसा होता है तो अनुशासन का दायरा टूटता है। इससे बचने के लिए यह आवश्यक है कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में नीतिगत मुद्दों पर खुलकर चर्चा हो। बेहतर होगा कि गंभीर मुद्दों पर खुली चर्चा की पहल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह करें या फिर संप्रग अध्यक्ष सोनिया गाधी। जब शीर्ष पर बैठे नेताओं के नेतृत्व में मंथन होगा तो विरोधाभासी मुद्दों पर समन्वय स्थापित करने में कहीं आसानी होगी।

Source: Jagran Nazariya




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