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पाकिस्तान की असलियत - News and Politics Hindi Blog

Posted On: 18 Jul, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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26/11 की घटना के उपरात भारत और पाकिस्तान में संबंध सुधारने के लिए बातचीत का जो सिलसिला कायम हुआ था वह लगभग बंद होने की कगार पर पहुंच गया है। मुंबई हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से बातचीत बंद कर यह तय किया था कि इस हमले के षड्यंत्रकारियों को दंडित किए जाने तक पाक से कोई बातचीत नहीं की जाएगी, लेकिन कुछ समय बाद पाक ने वार्ता के लिए शोर मचाना शुरू किया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी बातचीत की आवश्यकता पर बल दिया तो भारत ने वार्ता करने का निर्णय लिया और दोनों देशों के विदेश सचिवों ने नई दिल्ली में मुलाकात की। इसके बाद उनकी मुलाकात इस्लामाबाद में हुई। विदेश सचिव स्तर की वार्ता शुरू होने पर भारत में उसके औचित्य को लेकर आश्चर्य प्रकट किया गया था, क्योंकि पाकिस्तान ने मुंबई हमले के षड्यंत्रकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई करने के संकेत तक नहीं दिए थे। दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू होने पर यह माना गया कि इसके पीछे अमेरिका का दबाव हो सकता है। अमेरिका भारत से नाभिकीय समझौता करने के लिए आतुर है। भारत द्वारा पाक से वार्ता करने से इनकार करने की स्थिति में अमेरिकी प्रशासन के लिए अपनी संसद को इस समझौते के लिए राजी करने में कठिनाई आती। अमेरिका भारत-पाक में वार्ता होते हुए इसलिए भी देखना चाहता था, क्योंकि अफगानिस्तान के हालात सुधारने में उसे पाकिस्तान की मदद की आवश्यकता थी। इन परिस्थितियों में भारत-पाक के बीच वार्ता का दौर शुरू हुआ। विदेश मंत्री स्तर की वार्ता के पूर्व गृहमंत्री चिदंबरम पाकिस्तान गए। तब पाकिस्तान ने सकारात्मक रवैया प्रदर्शित किया, लेकिन इस बीच यह सामने आया कि पाकिस्तानी मूल का अमेरिकी आतंकी डेविड हेडली वस्तुत: लश्करे तोइबा का सक्रिय सदस्य था। अमेरिका में पकड़े गए हेडली ने भारतीय अधिकारियों को बताया कि मुंबई हमले की साजिश में पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई का पूरा-पूरा हाथ था।

विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने पाकिस्तान रवाना होने के पहले यह स्पष्ट कर दिया था कि वह आतंकवाद के मुद्दे पर खासतौर पर बातचीत करेंगे। इससे पाकिस्तान का असहज होना स्वाभाविक था। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच जिस तल्खी भरे माहौल में बातचीत हुई उससे दोनों देशों के रिश्तों में एक बार फिर कड़वाहट घुल गई। रही-सही कसर पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी की उन अमर्यादित टिप्पणियों ने पूरी कर दी जो उन्होंने कृष्णा के साथ बातचीत के बाद उनको लेकर कीं। पाकिस्तान ने यह भी बताने की कोशिश की कि वह उन बिंदुओं पर बातचीत नहीं करेगा जो बिंदु भारत की चिंता का विषय हैं। उसने कश्मीर का राग भी अलापा। कृष्णा और कुरैशी के बीच जिस तरह बातचीत हुई वह कोई शुभ संकेत नहीं। भले ही दोनों देशों ने आगे बातचीत जारी रखने का फैसला किया हो, लेकिन हाल फिलहाल वार्ता शुरू होने की उम्मीद कम है।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में बातचीत के लिए एजेंडे का दायरा तय होना आवश्यक होता है। पाकिस्तान जिस तरह आतंकवाद की अनदेखी कर कश्मीर पर बातचीत करना चाह रहा है उससे यह स्पष्ट है कि वह न तो मुंबई हमले के षड्यंत्रकारियों के खिलाफ कार्रवाई करना चाहता है और न ही भारत में आतंकियों की घुसपैठ पर लगाम लगाने का इच्छुक है। यह भी नए सिरे से स्पष्ट हुआ कि पाकिस्तान की सरकार पर सेना हावी है। पाक सरकार चाह कर भी सेना की अनदेखी करने में सक्षम नहीं। इन स्थितियों में वह न तो भारत को संतुष्ट कर सकती है और न ही विश्व समुदाय को।

अंतरराष्ट्रीय समस्या बन चुके आतंकवाद से जो देश सबसे अधिक पीडि़त हैं उनमें भारत प्रमुख है। पाकिस्तान में पल रहे आतंकी संगठन भारत के खिलाफ अघोषित युद्ध छेड़े हुए हैं। कश्मीर की अशांति के लिए भी वही जिम्मेदार हैं। पाकिस्तान कश्मीर की अराजकता को आजादी की जंग बताता है और शायद इसीलिए उसने यह कहा कि घुसपैठ रोकना भारत का सिरदर्द है, जबकि सच यह है कि यदि कश्मीर में आतंकियों की घुसपैठ समाप्त हो जाए तो वहां स्थिति सामान्य होने में समय नहीं लगेगा। चूंकि कश्मीर में शांति बहाली से पाकिस्तान के भारत विरोधी एजेंडे की हवा निकल जाएगी इसलिए वह आतंकियों की घुसपैठ जारी रखे हुए है। अमेरिका यह अच्छी तरह जानता है कि पाकिस्तान कश्मीर को भी अस्थिर रखना चाहता है और अफगानिस्तान को भी।

पाकिस्तान एक ओर कट्टरवादी संगठनों को पोषित कर कश्मीर और अफगानिस्तान में आतंक फैला रहा है और दूसरी ओर ऐसे संगठनों पर लगाम लगाने के बहाने अमेरिका से सैन्य मदद के साथ-साथ सामाजिक ढाचे में सुधार के लिए अकूत धन हासिल कर रहा है। पाकिस्तान के सैन्य तंत्र को यह स्थिति सुहाती है, क्योंकि भ्रष्टाचार पाकिस्तानी सेना में अंदर तक घुस चुका है। पाकिस्तान के शीर्ष सैन्य अफसर उस धन को आसानी से हड़प लेते हैं जो आम जनता के उत्थान के लिए अमेरिका से मिलता है। यही कारण है कि पाकिस्तानी सेना भारत के साथ संबंध सुधारने के लिए तैयार नहीं। पाक सेना की अड़ंगेबाजी के कारण ही दोनों देश के बीच दशकों से जारी वार्ता रिश्तों को सामान्य करने में सहायक नहीं बन पा रही है। बावजूद इसके बातचीत के जरिये ही पाकिस्तान को दबाव में लिया जा सकता है। कुछ दिनों बाद अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन इस्लामाबाद पहुंच रही हैं। यह स्पष्ट है कि वह यह जानना चाहेंगी कि भारत-पाक के बीच बातचीत कैसी रही? वह इससे अच्छी तरह अवगत हो गई होंगी कि कड़वाहट घोलने का काम किसने किया? अब उन्हें अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ अभियान में अपने साथी देश पाकिस्तान को क्या नसीहत दी और उसका असर उस पर पड़ा या नहीं?

पाकिस्तान को जब-जब उसकी करनी के सबूत दिए जाते हैं तब-तब वह लाल-पीला होकर विचित्र व्यवहार करने लगता है। विदेश मंत्री स्तर की वार्ता के दौरान भी उसने ऐसा ही किया। फिलहाल यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि पाकिस्तान अपनी गलतियों को स्वीकार करने के लिए तैयार होगा। एक तरह से यह अच्छा ही हुआ कि पाकिस्तान ने अपनी बौखलाहट का प्रदर्शन कर दिया। आगे की बातचीत में उस पर ही अधिक दबाव होगा, क्योंकि दुनिया ने यह अच्छी तरह देखा और समझा कि शाह महमूद कुरैशी ने किस तरह कूटनीतिक शिष्टाचार को ताक पर रख दिया। वैसे तो कृष्णा ने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कुरैशी को उन्हीं की भाषा में जवाब देकर साहस का परिचय दिया, लेकिन उनसे एक चूक यह अवश्य हुई कि वह उस समय मौन बने रहे जब कुरैशी आतंकी सरगना हाफिज सईद और भारतीय गृहसचिव जी के पिल्लै की तुलना कर रहे थे। यदि इस चूक का छोड़ दिया जाए तो कृष्णा के पाकिस्तान दौरे को भारत के दृष्टिकोण से सकारात्मक माना जा सकता है। पाकिस्तान ने बौखलाहट में जिस तरह कड़वाहट भरी संयुक्त प्रेस वार्ता की और कुरैशी ने कूटनीतिक शिष्टाचार और मेहमाननवाजी की मर्यादाएं तोड़ीं उससे पाकिस्तान सरकार की पोल ही खुली है। भारत को वार्ता के अगले दौर में इसका मनोवैज्ञानिक लाभ उठाना चाहिए।

Source: Jagran Hindi News


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