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जातियों की गिनती के खतरे

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दस वर्षों के अंतराल के बाद देश की जनगणना फिर शुरू हो गई है। इसके शुरू होते ही इस मांग ने जोर पकड़ लिया है कि इस बार की जनगणना में जातियों की भी गिनती की जानी चाहिए। इसके पहले जातिवार जनगणना 1931 में अंग्रेजों के शासन में हुई थी। इसके बाद उन्होंने भी जातिगत गणना नहीं कराई और स्वतंत्र भारत के शासकों ने भी इसकी आवश्यकता नहीं समझी, क्योंकि उनका लक्ष्य जातिविहीन समाज का निर्माण करना था। इसका एक परिणाम यह है कि भारत सरकार के पास इसके कोई ठोस आंकड़े नहीं हैं कि देश में किस जाति के लोगों की कितनी संख्या है? जो आंकड़े हैं भी वे 1931 की जनगणना पर आधारित हैं। यह ध्यान रहे कि 1931 में पाकिस्तान और बांग्लादेश का वजूद नहीं था।

स्पष्ट है कि 1931 के आंकड़े किसी भी दृष्टि से विश्वसनीय नहीं कहे जा सकते। अनेक राजनीतिक दल और विशेष रूप से राजद, सपा, जनता दल-यू जाति आधारित गणना के पक्ष में हैं और वे इसके लिए सरकार पर दबाव भी बना रहे हैं, लेकिन केंद्र सरकार दुविधा से ग्रस्त है। इस मामले में केंद्रीय मंत्रिमंडल भी बंटा हुआ है। जहां कानून मंत्री वीरप्पा मोइली और सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्री मुकुल वासनिक जातियों की गिनती के पक्ष में हैं वहीं कपिल सिब्बल और एमएस गिल सरीखे मंत्री इसके विरोध में हैं। केंद्रीय गृहमंत्री चिदंबरम की यह राय है कि जातियों की गिनती मूल जनगणना के साथ न होकर राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के साथ हो। इस विरोधाभास को देखते हुए केंद्र सरकार ने जातियों की गणना का सवाल मंत्रियों के एक समूह के हवाले कर दिया है।

सत्तारूढ़ दल की तरह से मुख्य विपक्षी दल भाजपा में भी जाति आधारित जनगणना को लेकर दो मत सामने आ रहे हैं। जहां कुछ नेता जातियों की गिनती के पक्ष में हैं वहीं वरिष्ठ भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने खुलेआम यह कहा है कि ऐसा करना विनाशकारी होगा। यह बात और है कि उन्होंने इसे अपनी निजी राय बताया है। केंद्रीय गृहमंत्रालय में राज्यमंत्री अजय माकन भी जातियों की गिनती के विरोध में खुलकर सामने आ गए हैं, लेकिन उन्होंने जब जाति आधारित गणना के विरोध में पार्टी के युवा सांसदों को पत्र लिखा तो उन्हें कांग्रेस की फटकार का सामना करना पड़ा। जब जनगणना में जातियों की गिनती को लेकर संसद में बहस हुई थी तो सरकार ने एक तरह से यह संकेत दिया था कि वह इसके लिए तैयार है, लेकिन अब वह पुनर्विचार करती दिख रही है।

यदि भारतीय राजनीति के मौजूदा रूप-स्वरूप को देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि लगभग सभी राजनीतिक दल जाति, मजहब, क्षेत्र आदि के आधार पर अपनी राजनीति करते चले आ रहे हैं। चूंकि जनगणना में धार्मिक समुदायों की भी गिनती होती है और अनुसूचित जाति एवं जनजातियों की भी इसलिए कथित अगड़ी एवं पिछड़ी जातियों की ही गणना होना शेष है। कुछ राजनेताओं और समाजशास्त्रियों का मानना है कि इन जातियों और विशेष रूप से पिछड़ी जातियों के आंकड़े सामने आने से सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के निर्धारण और क्रियान्वयन में सहूलियत मिलेगी तथा विभिन्न समूहों की आरक्षण की मांगों पर विचार करते समय भी सुविधा होगी। इसके विपरीत दूसरे खेमे का मानना है कि इससे जातिवाद को बल मिलेगा और जातिगत भेदभाव मिटाने के प्रयासों पर पानी भी फिरेगा।

जातियों के आधार पर राजनीति करना अथवा नीतियों का निर्धारण करना एक प्रकार से समय से पीछे जाना है। यदि जातिवार जनगणना हुई तो इसकी आशंका है कि उसका सदुपयोग कम, दुरुपयोग ज्यादा होगा। यह समय जातियों की संख्या के हिसाब से नीतियां बनाने का नहीं है। इससे समाज में जातीय भेदभाव बढ़ सकता है। वैसे इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय समाज में जाति का अपना एक अस्तित्व और महत्व है। राजनीतिक दल न केवल जातियों की महत्ता समझते हैं, बल्कि उसके आधार पर ही अपनी चुनावी रणनीति भी बनाते हैं। जातिवार जनगणना होने पर जाति के आधार पर राजनीति करने वाले दलों की सक्रियता और बढ़ सकती है।

इसी तरह जातीय आधार पर राजनीति करने वाले कुछ और दल भी सामने आ सकते हैं, लेकिन एक यथार्थ यह भी है कि जातीय समूहों के लिए बनाई जाने वाली योजनाओं का निर्धारण सही तरह से तभी हो सकता है जब ऐसे समूहों की वास्तविक संख्या का पता चले। अभी तो ऐसी नीतियां अनुमानित आंकड़ों पर आधारित हैं। अनुमानित आंकड़ों के आधार पर जातीय समूहों पर केंद्रित योजनाओं को चलाए रखने का कोई औचित्य नहीं। यह ठीक है कि राजनीतिक दलों को जाति आधारित राजनीति करने से रोकना कठिन है, लेकिन सरकारी योजनाओं का निर्धारण जातियों के बजाय आर्थिक आधार पर तो किया ही जा सकता है।

बेहतर हो कि जनकल्याणकारी योजनाओं का निर्माण समाज के आर्थिक पिछडे़पन के आधार पर किया जाए, न कि जातियों विशेष की संख्या के आधार पर और यह मानकर उनके पिछड़ेपन का कारण उनका अमुक जाति का होना है। सरकार अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन कुछ और समय के लिए उसी तरह करती रह सकती है जैसे अभी कर रही है। इसके साथ ही उसकी ओर से इस बात के ठोस प्रयास किए जाने चाहिए कि धीरे-धीरे शासन की सामाजिक जिम्मेदारियों के निर्वहन में जाति की महत्ता समाप्त हो। इसके लिए सामाजिक कल्याण की योजनाओं में परिवर्तन करना होगा। सरकारी कामकाज में जहां-जहां पर जाति का जिक्र होता है उसे भी समाप्त करना होगा। यही वह उपाय है जिससे जातिगत विभाजन और वैमनस्य की दरारों को पाटा जा सकता है।

यह समय ही बताएगा कि मंत्रियों का समूह जातिवार जनगणना पर क्या फैसला करता है, लेकिन यदि जातिवाद की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों के समक्ष झुका गया और जातियों की गिनती कराई गई तो इससे देश कई दशक पीछे जा सकता है। आज की आवश्यकता जातिगत भेदभाव को समाप्त करने की है, न कि जाने-अनजाने उसे बढ़ावा देने की। जाति आधारित राजनीति को बल मिलने से सामाजिक समरसता का माहौल दूषित हो सकता है। जब यह अंदेशा है कि जातियों की गिनती से लाभ कम, नुकसान अधिक हो सकता है तो फिर ऐसा काम करने से बचने में ही भलाई है।


Source: Jagran Nazariya News







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