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एक फांसी का सवाल

Posted On: 9 May, 2010 Others में

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जैसी कि पूरे देश को उम्मीद थी वैसा ही हुआ और मुंबई हमले के दौरान रंगे हाथों पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकी अजमल आमिर कसाब को फांसी की सजा सुना दी गई। लगभग पांच सौ दिन तक चले इस मामले में जज ने हर पहलू को बारीकी से समझा और कसाब को पांच आरोपों में फांसी तथा पांच में उम्र कैद की सजा सुनाई। कसाब को फांसी की सजा देने के फैसले का देश के विभिन्न हिस्सों और खासकर मुंबई में स्वागत किया गया। लोगों ने आतिशबाजी छोड़कर अपनी भावनाओं का इजहार किया।

कसाब के वकील ने उसे कठोर सजा न देने के लिए उसके मानसिक रूप से असंतुलित होने, लश्करे तैयबा के बहकावे में आने तथा सुधरने का एक और मौका देने की जो दलीलें दीं उन्हें अदालत ने यह कहकर खारिज किया कि एक ऐसे शख्स के प्रति मानवता नहीं दिखाई जा सकती जिसने निर्मम तरीके से जानबूझकर हत्याएं कीं। उन्होंने यह भी कहा कि उसके सुधरने की कहीं कोई गुंजाइश नहीं और उसके प्रति नरमी बरतने से न्यायिक व्यवस्था के प्रति आम आदमी का भरोसा कम होगा। मुंबई हमले के दौरान कसाब न केवल रंगे हाथ पकड़ा गया था, बल्कि राइफल लिए हुए उसके फोटो भी खींचे गए थे।

इसके बावजूद उसके वकील केपी पवार ने उसके बचाव में यथासंभव दलीलें दीं। कुछ इसी तरह की दलीलें कसाब के पहले वकील आजमी ने भी दी थीं। उन्होंने तो उसे नाबालिग सिद्ध करने का भी प्रयास किया था।

एक समय खुद कसाब ने अपने ऊपर लगे सारे आरोपों को स्वीकार करते हुए खुद के लिए मौत की सजा मांगी थी। इसके बावजूद न्यायिक प्रक्रिया अपनी तरह से जारी रही। यह इसलिए आवश्यक था ताकि पाकिस्तान और साथ ही शेष विश्व को यह बताया जा सके कि कसाब के मामले की सुनवाई विधि सम्मत तरीके से पूरी हुई। देश के चुनिंदा विधि विशेषज्ञों का भी यही मानना है कि कसाब का ट्रायल सही तरीके से हुआ। वे उसकी फांसी की सजा को भी उपयुक्त मान रहे हैं।

भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने के मामले में कसाब पहला ऐसा आतंकी नहीं जिसे मौत की सजा दी गई है। इसके पहले संसद पर हमले के आरोपी अफजल को भी मौत की सजा सुनाई जा चुकी है। 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे दी गई फांसी की सजा की पुष्टि कर दी थी। दुर्भाग्य से उसे फांसी देने के पहले राजनीति शुरू हो गई। कश्मीर के कुछ नेताओं ने उसे फांसी देने का इस आधार पर विरोध किया कि इससे घाटी के लोगों के बीच सही संदेश नहीं जाएगा। उनका तर्क था कि यदि अफजल को फांसी दी गई तो कश्मीर के अलगाववादी उसे भारत के खिलाफ युद्ध में शहीद का दर्जा दे देंगे, जबकि वह एक अपराधी है। हालांकि ये तर्क देने वाले शांत हो गए हैं, लेकिन अफजल की दया याचिका अभी भी सरकारी फाइलों में अटकी है। माना जा रहा है कि उसकी अपील अभी राष्ट्रपति तक भी नहीं पहुंची है। कसाब के फैसले के बाद अफजल का मामला फिर चर्चा में है।

यह सर्वविदित है कि पाकिस्तान से आए दिन आतंकी घुसपैठ करते हैं और न जाने कितने आतंकी सुरक्षा बलों की गोलियों को शिकार बनते हैं। यह कसाब की किस्मत ही रही कि वह मुंबई में लाठीधारी पुलिसकर्मियों के हत्थे चढ़ गया और उसका वह हश्र नहीं हुआ जैसा उसके नौ साथियों का हुआ। उसके जीवित पकड़े जाने का एक परिणाम यह हुआ कि भारत यह स्थापित करने में सफल रहा कि मुंबई हमले में लश्करे तैयबा का हाथ है। कसाब ने खुद अपने इकबालिया बयान में यह माना था कि लश्कर के लोगों ने उसे प्रशिक्षण दिया और फिर मुंबई पर हमला करने के लिए रवाना किया। कसाब की तरह अफजल भी एक आतंकी संगठन जेकेएलएफ का सदस्य है और संसद पर हमले की साजिश भी पाकिस्तान में ही रची गई थी। कसाब और अफजल पर यह आरोप भी साझा है कि दोनों ने भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने का काम किया। दोनों में अंतर है तो केवल राष्ट्रीयता का। कसाब फरीदकोट का रहने वाला है तो अफजल कश्मीर का। यदि कसाब को फांसी की सजा देने के फैसले का चौतरफा स्वागत किया जा रहा है तो अफजल को फांसी देने में असमंजस क्यों? स्पष्ट है कि संकीर्ण राजनीतिक कारणों से अफजल को जिंदा रखा जा रहा है। ऐसा करके देश की जनता को कोई सही संदेश नहीं दिया जा रहा।

यह समय ही बताएगा कि कसाब विशेष अदालत को चुनौती देता है या नहीं और ऊंची अदालतों में फैसला अपरिवर्तित रहने पर दया याचिका दाखिल करता है या नहीं, लेकिन यदि उसे फांसी देने की नौबत आई तो जल्लाद की कमी आड़े आ सकती है। देश में करीब पचास लोग ऐसे हैं जिन्हें फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। इनमें से करीब तीस लोगों की दया याचिका पर निर्णय होना शेष है। यह आश्चर्यजनक है कि विभिन्न दुर्लभ मामलों में फांसी की सजा तो दी जा रही है, लेकिन यह सजा देने की व्यवस्था लगभग दम तोड़ चुकी है।

आमतौर पर फांसी की सजा विशेष परिस्थितियों में तब दी जाती है जब अदालत इस नतीजे पर पहुंचती है कि मानवता का हरण करने और राक्षसी प्रवृत्ति का परिचय देने वाले किसी अपराधी का जीवित रहना सभ्य समाज के लिए खतरा बन सकता है। अब यदि ऐसे व्यक्तियों की फांसी की सजा पर अमल नहीं होगा तो फिर बर्बर प्रवृत्ति वाले लोगों और खासकर आतंकियों तक कोई कठोर संदेश कैसे जाएगा? अगर फांसी देने के मामले में जल्लादों की कमी आड़े आ रही है तो फिर या तो यह कमी दूर की जानी चाहिए या फिर मौत की सजा देने के अन्य उपायों पर विचार होना चाहिए। कई देशों में इसके लिए वैकल्पिक उपाय अपनाए जा रहे हैं, जैसे कि बिजली का करंट देना या फिर गोली मारना।

कसाब को सजा सुनाने वाले जज एमएल तहलियानी ने स्पष्ट रूप से यह कहा है कि उसकी फांसी में विलंब कंधार जैसी घटना को जन्म दे सकता है। भारत इसे विस्मृत नहीं कर सकता कि भारतीय विमान का अपहरण कर उसे कंधार ले जाने वाले आतंकियों की मांगों के समक्ष किस तरह झुकना पड़ा था! भारत को अपने लोगों को बचाने के लिए कई खूंखार आतंकियों को छोड़ना पड़ा था। कसाब के साथी आतंकी उसे छुड़ाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। कसाब की सुरक्षा में करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। एक आतंकी की सुरक्षा पर धन खर्च करने का कोई मतलब नहीं। कहीं ऐसा न हो कि कसाब को फांसी न देना या उसकी फांसी में विलंब करना भारत को भारी पड़ जाए।


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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kalyan kumar के द्वारा
May 23, 2010

अफजल और कसाब को जल्द से जल्द मौत की सजा मिलनी चाहिए। जल्लादों की कमी की समस्या दूर की जा सकती है। अमेरिका में जहरीले इंजेक्शन और इलेक्ट्रिक चेयर के जरिये मौत की सजा देने का प्रावधान है।   2008 में वहां 37 और 2009 में 44 लोगों को यह सजा उपरोक्त पद्धतियों से दी जा चुकी है। अफजल और कसाब को सजा मिलने से यह संदेश जाएगा कि आतंकवाद के मामले में भारत सख्त है। अफजल की सजा टलने से उन लोगों के हौसले बुलंद हैं जो आतंकवाद फैलाने में लिप्त हैं या मानवाधिकार के नाम पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेंक रहे हैं। ऐसा नहीं है कि अफजल की सजा टलने से भारत पर आतंकवाद का खतरा टल गया है। सरकार को आतंकवाद के संबंध में लिये गए अपने संकल्पों को याद रखना चाहिए। किसी भी तरह की ढिलाई से आतंकवाद पर भारत के लचर रवैये का संदेश ही जाएगा। 

digvijaytrivedi के द्वारा
May 13, 2010

लेख में दिए गए “तथ्य” और उसका “सार” देश के कटु अनुभवों की कसौटी पर बिलकुल सही है. फांसी हो …………और बहुत ज़ल्द हो. ताकि न्याय पर भरोसा कायम हो सके. यधपि कसाब का न्याय एक त्वरित न्यायालय के माध्यम से हुआ है ……….लेकिन फिरभी इसमे २० माह लग गए. मुझे आशा है फांसी होने में इतना वक़्त नहीं लगेगा. साथ ही अफ़ज़ल पर भी त्वरित निर्णय ले देश के साथ न्याय होगा. ताकि सिद्ध हो पाये कि न्याय व्यस्था पापियों के संरक्षण हेतु नही, बल्कि देश्द्रोहियो को दण्ड देने मे सक्षम है.

Ram Kumar Pandey के द्वारा
May 10, 2010

भारत इस तरह के उदाहरण पेश कर अपने साफ्ट स्टेट होने का ही सिर्फ नमूना देता है. राजनीतिक गलतियों का खामियाजा जनता क्यों भुगते ?

manoj के द्वारा
May 10, 2010

कसाब की फांसी ने कई लोगों की नींद गायब कर रखी हैं. भारत की नीतियां ही आज उसके न्याय में आडे आ रही है , हर भारतीय बडा भावुक होता है और फांसी जैसे फसलों पर जल्दबाजी नही कि जाती . अब इसके पीछे राजनीतिक दवाब मानें या सामाजिक पता नही लेकिन कसाब को जल्द फांसी होनी चाहिए.

Pappu tiwari के द्वारा
May 10, 2010

हमारॆ कानून बेवसथा में बहूत खामीया है ईसमे सूधार की अती जरुरत है 

dhananjay singh के द्वारा
May 9, 2010

आपने वो बात लिखी है जो सारा देश चाहता है.पर इस देश में आम आदमी की बात का कोई महत्व नहीं है.ये मीडिया के ही लोग है जो इस बात के लिए सरकार को झुका सकते है की कसाब को जल्द से जल्द फांसी हो .वरना कभी कानून का हवाला दिया जायेगा की कानून आपने स्तर पर ये काम करेगा की कब किसको फासी देनी है वरना अफजल गुरु के फासी की तरह पुरे देश के धरम निरपेछ इस पर हल्ला मचा देंगे .तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता शोर मचाएंगे

Manish Kumar के द्वारा
May 9, 2010

Kahte hai ki umra bhar kio bhi jung lad nahi sakta, tum bhi tut jaoge ye tajurba hamara hai…..lekin yeh baat shyad in hinsa parast logo ke jehan me nahi aa sakti. Kasab ki badkismati to usi din se arambh ho gaye jab hamle ke bad woh jinda bach gaya. Beshak use phansi dene me deri ho jaye….lekin pakde jane ke baad uskin her raat aur din kya maut se kam hai……Pakistan se aakar Bharat ke kisi jail me band us saksh ki halat to sochiye jo atank ka me paryar ban chuka hai……

Dr S Shankar Singh के द्वारा
May 9, 2010

कसाब के मृत्युदंड को लेकर जन मानस आशंकित है क्योंकि अफ़ज़ल का उदाहरण हमारे सामने है. मृत्यदंड दिया जाएगा भी या नहीं इसका उत्तर देना कोई मुश्किल काम नहीं है. न्यायपालिका ने तो अपना कर्त्तव्य कर दिया. इसके बाद सामान्य न्यायिक प्रक्रिया चलेगी. फांसी की हाई कोर्ट द्वारा पुष्टि अभी बाकी है. इसके उपरांत हाई कोर्ट में अपील दायर की जा सकती है. हाई कोर्ट में असफल होने पर सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट से सजा बहाल रहने पर, राष्ट्रपति के यहाँ क्षमा याचना दाखिल की जा सकती है. कहने का मतलब है अभी लम्बी न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना है. राष्ट्रपति के यहाँ क्षमा याचना पहुंचने पर सरकार को ‘वोट बैंक’ को ध्यान रखने की भी मजबूरी होगी. आख़िर राजनीतिक हितों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता. मुझे आश्चर्य होगा अगर मानवाधिकार वाले इसमें न कूदें. अपने को मानवाधिकारवादी, बुद्धिजीवी और सेक्युलर साबित करने का इतना सुनहरा मौका ये लोग नहीं छोड़ने वाले.


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