blogid : 119 postid : 8

आस्ट्रेलिया में अनहोनी

Posted On: 10 Jan, 2010 न्यूज़ बर्थ में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

AUSTRALIA-INDIA-EDUCATION-CRIMEआस्ट्रेलिया में पिछले सप्ताह भारतीय छात्र नितिन गर्ग की नृशंस हत्या और एक अन्य छात्र का अधजला शव मिलने के बाद इस देश में रह रहे भारतीयों पर पिछले ढाई वर्षाे से हो रहे हमलों की भयावहता सामने आ गई। इसका एक ताजा उदाहरण गत दिवस एक और भारतीय को जिंदा जलाने की कोशिश है। इससे तो यही पता चलता है कि इस देश में भारतीयों की जान के लाले पड़ गए हैं। पिछले पांच-छह वर्षो में एक बड़ी संख्या में विदेशी छात्र पढ़ाई करने के आस्ट्रेलिया गए हैं। इसका प्रमुख कारण आस्ट्रेलियाई शिक्षा संस्थानों में आसानी से प्रवेश मिलना और पढ़ाई के बाद वहीं बसने की संभावना भी है। भारतीय छात्रों ने यूरोप, अमेरिका और कनाडा की तुलना में आस्ट्रेलिया में जाकर पढ़ाई करना इसलिए पसंद किया, क्योंकि अन्य विकसित देशों की तुलना में यहां के वीजा नियम उदार हैं और फीस भी अपेक्षाकृत कम है। इस सबके अतिरिक्त पढ़ाई के दौरान काम करते हुए फीस चुकाने लायक पैसे कमाने के अवसर भी हैं। आस्ट्रेलिया में भारत, चीन एवं अन्य देशों के लाखों छात्र अध्ययन के लिए जा रहे हंै। इसके चलते वहां का शिक्षा उद्योग तेजी के साथ फल-फूल रहा है, लेकिन पिछले कुछ समय से यह देश भारतीय छात्रों के लिए एक खतरनाक स्थान बन गया है। आस्ट्रेलिया सरकार इसका अहसास करने के बजाय सिर्फ इसमें दिलचस्पी ले रही है कि भारतीय छात्रों के चलते उसके शिक्षा संस्थान फलते-फूलते रहें। आस्ट्रेलिया भौगोलिक रूप से जितना विशाल है, उसकी आबादी उतनी ही कम है। इतने अधिक क्षेत्रफल और इतनी कम आबादी वाला विकसित देश और कोई नहीं। चूंकि आस्ट्रेलिया में जनसंख्या वृद्धि दर सीमित है और अर्थव्यवस्था बड़ी संख्या में कामगारों की मांग कर रही है इसलिए नर्स, ड्राइवर, सफाई कर्मियों के साथ-साथ अन्य छोटे-मोटे कार्याे के लिए काम करने वालों की आवश्यकता बढ़ रही है। माना जाता है कि आस्ट्रेलिया ने इन्हीं कारणों से अपने वीजा नियम उदार बना रखे हैं। आस्ट्रेलिया में विदेशी और विशेष रूप से भारतीय छात्रों की बढ़ती संख्या ने यहां के शांत एवं व्यवस्थित जीवन में कुछ हलचल पैदा की है। आस्ट्रेलिया के लगभग सभी प्रमुख शहरों और विशेष रूप से विक्टोरिया प्रांत के शहरों में लाखों विदेशी छात्रों के पहुंचने से उनका आधारभूत ढांचा भी कुछ अव्यवस्थित हुआ है और साफ-सफाई की समस्या भी पैदा हुई है। लगता है कि आस्ट्रेलिया के लोगों का एक वर्ग यह नहीं चाहता कि उनके शांत जीवन में कोई खलल पड़े। शायद वे अपनी सभ्यता में ढल न पाने वाले भारतीयों को खास तौर पर नापसंद कर रहे हैं। आश्चर्य नहीं कि ऐसे ही कुछ लोग भारतीयों को निशाना बनाने पर तुल गए हो। यदि भारतीय छात्रों पर हो रहे हमले नस्लीय हिंसा का परिणाम नहीं हैं जैसा कि आस्ट्रेलिया सरकार तोता रंटत शैली में दावा कर रही है तो फिर वही बताए कि उन पर हमले क्यों हो रहे हैं? भारतीयों पर हमले रोकना आस्ट्रेलिया सरकार की जिम्मेदारी है, क्योंकि भारतीय छात्र वहां बिन बुलाए नहीं गए। अभी पिछले वर्ष स्वयं विक्टोरिया के प्रधानमंत्री भारतीयों को यह आश्वासन देने आए थे कि अब सब कुछ सामान्य है और भारतीय छात्र ज्यादा से ज्यादा संख्या में उनके यहां आ सकते हैं। नितिन गर्ग की हत्या के बाद आस्ट्रेलिया इसकी कोशिश में जुटा है कि इसे नस्लीय हिंसा का मामला न माना जाए, लेकिन वह न तो हत्या काकारण बता पा रहा है और न ही ऐसे आश्वासन देने के लिए तैयार है कि भारतीयों को निशाना बनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करेगा। आखिर नितिन गर्ग के हत्यारे का सुराग मिलने के पहले ही आस्ट्रेलियाई पुलिस यह कैसे जान गई कि यह नस्लीय हमला नहीं है? अब आस्ट्रेलिया सरकार इस अभियान में जुट गई है कि भारत नितिन गर्ग की हत्या को लेकर उन्माद भड़का रहा है, जबकि उन्माद तो उसके अपने वे लोग दिखा रहे हैं जो भारतीयों पर हमले कर रहे हैं। आस्ट्रेलिया का यह रवैया दोनों देशों के रिश्तों में खटास लाने वाला है। वस्तुत: यह वह रवैया है जो उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत चरितार्थ कर रहा है। यह भी विचित्र है कि आस्ट्रेलिया सरकार के रवैये पर भारत सरकार कभी कड़े तेवर का परिचय देती है तो कभी ढुलमुल नजर आने लगती है। आखिर विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के इस कथन का क्या मतलब कि भारतीय छात्र सोच-समझ कर आस्ट्रेलिया पढ़ने जाएं? कहीं ऐसा तो नहीं कि आस्ट्रेलिया भारत को यह समझाने में सफल रहा कि भारतीयों पर हो रहे हमले नस्लीय हिंसा का परिणाम नहीं? क्या भारत सरकार को आस्ट्रेलिया से यह जानने की कोशिश नहीं करनी चाहिए कि आखिर ये हमले किस कारण हो रहे हैं? आखिर सरकार अपने उन लोगों की बात क्यों नहीं मान रही जो डरे-सहमे हैं, जिनकी सुरक्षा की परवाह नहीं की जा रही और जो स्वयं यह कह रहे हैं कि उन्हें खास तौर पर निशाना बनाया जा रहा है? आज भले ही आस्ट्रेलिया नस्लभेद से इनकार करे, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि उसका इतिहास नस्लभेदी हिंसा से भरा पड़ा है। आस्ट्रेलिया के नागरिक मूलत: यूरोप से गए लोग हैं। इन्हीं लोगों ने बाद में आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों (एबोरिजिनल) का निर्ममता से दमन किया। वे आज भी अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। 1965 तक तो इन लोगों को वोट देने तक का अधिकार भी नहीं था। हाल में खुद प्रधानमंत्री केविन रड ने आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों से उन पर हुए अत्याचारों के लिए माफी मांगी थी। यह भी एक तथ्य है कि भारतीयों पर हमले के पूर्व अफ्रीका और यूनान के नागरिक भी आस्ट्रेलियाइयों की बदसलूकी का शिकार हो चुके हैं। यदि आस्ट्रेलिया यह नहीं चाहता कि भारत उसके इस अतीत का स्मरण करे तो फिर उसे भारतीयों पर हो रहे हमले रोकने के लिए कुछ ठोस कार्रवाई करनी चाहिए और अगर वह भारतीयों की सुरक्षा नहीं कर सकता तो फिर उसे उन्हें वीजा देना बंद कर देना चाहिए। यह आश्चर्यजनक है कि विश्व समुदाय और मानवाधिकार संगठन भी आस्ट्रेलिया की घटनाओं पर मौन धारण किए हंै? आस्ट्रेलिया में पिटते भारतीयों को लेकर विश्व समुदाय की चुप्पी का कारण चाहे जो हो, एक वर्ष में 1400 से अधिक छात्रों पर हमला होना सामान्य बात नहीं। भारत की ओर से आस्ट्रेलिया को यह संदेश देने की जरूरत है कि यदि वह भारतीय छात्रों की रक्षा नहीं कर सकता तो उन्हें निमंत्रण देना बंद करे। केवल भारतीय छात्रों को सलाह देने का कोई मतलब नहीं, क्योंकि प्रथमदृष्टया यही साबित हो रहा है कि भारतीय छात्रों पर हमले नस्लीय कारणों से हो रहे हैं और आस्ट्रेलियाई सरकार जानबूझकर सच्चाई से मुंह मोड़ रही है। यदि आस्ट्रेलिया सरकार भारतीय छात्रों पर होने वाले हमलों पर गंभीरता का परिचय नहीं देती तो फिर भारत को इस देश को भारतीयों के लिए असुरक्षित घोषित करने में संकोच नहीं करना चाहिए। इससे भी बात न बने तो व्यापारिक मामलों में उसकी उपेक्षा की जानी चाहिए। ध्यान रहे कि जो सरकार अपने नागरिकों की रक्षा के लिए तत्परता नहीं दिखाती वह विश्व में कहीं सम्मान नहीं पाती।



Tags:     

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (9 votes, average: 4.33 out of 5)
Loading ... Loading ...

10 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Suneel Pathak Jagran Faizabad के द्वारा
January 30, 2010

आदरणीय सर आपका यह कहना कि (ध्यान रहे कि जो सरकार अपने नागरिकों की रक्षा के लिए तत्परता नहीं दिखाती वह विश्व में कहीं सम्मान नहीं पाती।) बिल्‍कुल सही है। देश के नागरिकों की रक्षा सरकार का कर्तव्‍य है। जनता के वोटों की जिस शक्ति के बूते वह दिल्‍ली तक पहुंचे हैं और जनता की रहनुमाई करने का दम्‍भ भरते हैं उस पर खरा उतरना भी उनका दायित्‍व है। लेकिन दायित्‍वों की अनदेखी के मामले में लगभग हर दल की सरकार ने अपना परचम ही लहराया है। विदेश में हुए हमलों की बात तो दूर यहां के जनप्रतिनिधि तो देश में ही अपने नागरिकों की सुरक्षा का दायित्‍व स्‍वीकारने में अक्षम साबित होते हैं। रियाज जी ने अपने ब्‍लाग में रेल राज्‍य मंत्री की प्रेस कांफ्रेस का जिक्र किया है जिसमें मंत्री जी ने कहा कि 63 हजार किलोमीटर रेलवे लाइनें और 10 हजार ट्रेनें। अगर एक-दो एक्सीडेंट हो जाते हैं तो चलता है….।’ 28 जनवरी 2009 रेल राज्यमंत्री केएच मुनियप्पा लखनउ में प्रेस कांफ्रेस के दौरान दायित्‍वों से मुंह मोड लेने की स्थिति देश में ही खडी हो चुकी है ऐसे में विदेशों में हो रहे हमलों को लेकर आखिर ये छात्रों को यही सलाह देंगे कि आप वहां जाएं ही न । न आप जाएंगे न हमले होंगे। कायरतापूर्ण निर्णयों की वजह से ही देश की छीछालेदर हो रही है।

Riyaz Hashmi, Jagran के द्वारा
January 30, 2010

काश… भारत सरकार में इतनी इच्छाशक्ति होती। यदि सरकार में संवेदनशीलता है तो उसे आपके अंतिम वाक्य पर ज़रूर गौर करना चाहिए। ….ध्यान रहे कि जो सरकार अपने नागरिकों की रक्षा के लिए तत्परता नहीं दिखाती वह विश्व में कहीं सम्मान नहीं पाती, यह बात सोलह आने सच है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण अमेरिका है जो दुनिया भर के देशों में अपने नागरिकों की रक्षा को हमेशा तत्पर रहता है और खुद आस्ट्रेलिया ही इस तत्परता में कहां पीछे है। मुझे आज भी याद है कि इंटरनेशनल आतंकी मौलाना मसूद अज़हर को तिहाड़ जेल से रिहा कराने के वास्ते अपहृत दो आस्ट्रेलियाई और तीन ब्रिटिश नागरिकों को 2 नवंबर 1994 को सहारनपुर में आतंकियों के कब्जे से सकुशल छुड़ाया गया था। इस आपरेशन में साहिबाबाद (ग़ाज़ियाबाद) के इंस्पेक्टर ध्रुव लाल यादव और सिपाही राजेश यादव शहीद हुए थे। इस पूरी कार्रवाई का आब्जर्वेशन तब पीएमओ कर रहा था जो आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के दबाव का ही तो परिणाम था। वैसे भारतीय छात्रों पर हमले खुद आस्ट्रेलिया के लिए भी घातक हैं क्योंकि आस्ट्रेलियाई शिक्षा उद्योग के लिए ये बुरा संकेत हैं। आस्ट्रेलिया में अध्ययन के लिए भारतीयों की ओर से छात्र वीजा के लिए किए जाने वाले आवेदनों में भारी कमी आई है। इस गिरावट को हमलों के संदर्भ में ही देखा जा रहा है। आव्रजन विभाग द्वारा पिछले साल की जुलाई-अक्टूबर अवधि के लिए जुटाए गए आंकड़ों से पता चलता है कि छात्र वीजा के लिए भारतीयों की ओर से दिए जाने वाले आवेदनों में पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 46 फीसदी की गिरावट हुई है। सिडनी मॉर्निग हेराल्ड अखबार ने तो यहां तक लिखा है कि आवेदनों की संख्या में यह भारी गिरावट देश के 17 अरब डालर के अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा उद्योग के लिए बुरा संकेत है। पिछले 12 महीनों में आस्ट्रेलिया में अध्ययनरत भारतीय छात्रों की संख्या करीब 115,000 रही। जाहिर है, भारतीय छात्र इस उद्योग की आय का बड़ा जरिया हैं। भारतीयों पर हमलों से दूसरे अंतर्राष्ट्रीय छात्रों में भी असुरक्षा की भावना घर कर गई है। भारतीय छात्रों की संख्या में कमी से व्यावसायिक पाठ्यक्रमों पर व्यापक नकारात्मक असर पड़ेगा। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और दूसरे देशों की इस मसले पर खामोशी शायद इसीलिए है कि जब भारत सरकार ही दो टूक प्रतिक्रिया या दबाव नहीं बना पाई तो बाकियों को क्या मतलब।

anupam के द्वारा
January 30, 2010

आज 29 जनवरी को भारत ने फिर एक और एडवाइजरी जारी कर छात्रों को आस्ट्रेलिया ना जाने को कहा है पर इससे कुछ नहीं होने वाला। मैंने पहले भी कहा था कि भारत को कड़ा कदम उठाना होगा। अभी उसी कड़े कदम के इंतजार में हूं मैं।

Munish Dixit के द्वारा
January 19, 2010

आदरणीय महोदय, ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई कर रहे छात्रों पर नस्ली हमले चिंता की बात है। आपकी बात पूरी तरह से सही है कि यदि आस्ट्रेलिया सरकार भारतीय छात्रों पर होने वाले हमलों पर गंभीरता का परिचय नहीं दे रही तो फिर भारत को इस देश को भारतीयों के लिए असुरक्षित घोषित करने में संकोच नहीं करना चाहिए। इससे भी बात न बने तो व्यापारिक मामलों में उसकी उपेक्षा की जानी चाहिए। भारत सरकार को इस मामले की गंभीरता को देखते हुए जलद कदम उठाना चाहिए।

anupam के द्वारा
January 12, 2010

इस मामले में भारत की सरकार का रवैया शुरू से ढुलमुल रहा है। बस, एक पत्र लिखा और चुप। अमेरिका को देखिए। जब भी कभी भारत में आतंकियों ने हमले किए फौरन उन्होंने भारत ना जाने की सलाह अपने नागरिकों को दे डाली। हमारी सरकार ने एसा कभी नहीं किया। लगता है वहां भी कोई मनसे जैसा संगठन गुप्त रूप से सक्रिय है जो भारतियों पर इस तरह से हमले कर रहा है। सरकार को इस पर कड़ा स्टैंड लेना चाहिए।

Ram Kumar Pandey के द्वारा
January 11, 2010

संजय जी, यह बिलकुल सच है कि हमने अपने नागरिकों की रक्षा के उचित प्रबंध नहीं किए जिसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. लेकिन इस मसले पर एक सुझाव यह है कि उच्च शिक्षा के लिए विदेश का मुंह ना देखना पड़े इसके लिए देश में ही उच्च कौशल संपन्न यूनिवर्सिटी व कालेज तैयार किए जाए जहां पर शोध सहित हर वह सुविधाएं उपलब्ध हों जिसकी तलाश में हमें विदेश जाना पड़ता है. यानी हमें स्वयम ही मजबूत बनना होगा तभी हम सम्मान पा सकेंगे.

shagun sharma के द्वारा
January 11, 2010

ऑस्ट्रेलिया की वास्तविकता को लिखने पर आपकी जितनी सरहना की जाये कम है ! धन्यवाद! शगुन शर्मा ऑस्ट्रेलया

Sanjay Bhardwaj के द्वारा
January 11, 2010

सचमुच ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई कर रहे छात्रों पर नस्ली हमले चिंता की बात है लेकिन इससे भी ज्यादा चिंताजनक है भारत सरकार का सुस्त रवैया। आखिर क्या वजह है कि सरकार इस मामले में केवल कार्रवाई का आश्वासन पाकर चुप बैठ जाती है। यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब छात्रों को अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर स्वदेश लौटने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। आपने आस्ट्रेलिया की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया, आशा है इससे सरकार की कुंभकर्णी निंद्रा टूटेगी और वह कोई ठोस कार्रवाई करने के लिए बाध्य होगी। संजय भारद्वाज

rakesh bhartiya के द्वारा
January 11, 2010

धन्यवाद संजय जी,आपने ऑस्ट्रेलया की सही तस्वीर का बेबाकी से वर्णन किया है,साधुवाद! यहाँ इतनी बुरे हालात है की भारतीय छात्रों की शिकयत तक दर्ज नहीं की जाती ,धन्यवाद दुनिया को अपनी लेखनी के माध्यम से सच उज्जागर करने के लिये राकेश भारतीय मैल्बुर्ण


topic of the week



अन्य ब्लॉग

  • No Posts Found

latest from jagran