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Sanjay Gupta


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सुलगता कश्मीर

Posted On: 19 Sep, 2010  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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सरकार और समन्वय

Posted On: 26 Jul, 2010  
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Others न्यूज़ बर्थ पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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पाकिस्तान की असलियत – News and Politics Hindi Blog

Posted On: 18 Jul, 2010  
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दरकता शहरी ढांचा

Posted On: 4 Jul, 2010  
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सवालों के घेरे में वापसी

Posted On: 27 Jun, 2010  
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सुधारों से दूर शैक्षिक ढांचा

Posted On: 20 Jun, 2010  
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काम न करने वाली सरकार

Posted On: 6 Jun, 2010  
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एक फांसी का सवाल

Posted On: 9 May, 2010  
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अनीति से भरी राजनीति

Posted On: 2 May, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

अफजल और कसाब को जल्द से जल्द मौत की सजा मिलनी चाहिए। जल्लादों की कमी की समस्या दूर की जा सकती है। अमेरिका में जहरीले इंजेक्शन और इलेक्ट्रिक चेयर के जरिये मौत की सजा देने का प्रावधान है।   2008 में वहां 37 और 2009 में 44 लोगों को यह सजा उपरोक्त पद्धतियों से दी जा चुकी है। अफजल और कसाब को सजा मिलने से यह संदेश जाएगा कि आतंकवाद के मामले में भारत सख्त है। अफजल की सजा टलने से उन लोगों के हौसले बुलंद हैं जो आतंकवाद फैलाने में लिप्त हैं या मानवाधिकार के नाम पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेंक रहे हैं। ऐसा नहीं है कि अफजल की सजा टलने से भारत पर आतंकवाद का खतरा टल गया है। सरकार को आतंकवाद के संबंध में लिये गए अपने संकल्पों को याद रखना चाहिए। किसी भी तरह की ढिलाई से आतंकवाद पर भारत के लचर रवैये का संदेश ही जाएगा। 

के द्वारा:

कसाब के मृत्युदंड को लेकर जन मानस आशंकित है क्योंकि अफ़ज़ल का उदाहरण हमारे सामने है. मृत्यदंड दिया जाएगा भी या नहीं इसका उत्तर देना कोई मुश्किल काम नहीं है. न्यायपालिका ने तो अपना कर्त्तव्य कर दिया. इसके बाद सामान्य न्यायिक प्रक्रिया चलेगी. फांसी की हाई कोर्ट द्वारा पुष्टि अभी बाकी है. इसके उपरांत हाई कोर्ट में अपील दायर की जा सकती है. हाई कोर्ट में असफल होने पर सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट से सजा बहाल रहने पर, राष्ट्रपति के यहाँ क्षमा याचना दाखिल की जा सकती है. कहने का मतलब है अभी लम्बी न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना है. राष्ट्रपति के यहाँ क्षमा याचना पहुंचने पर सरकार को 'वोट बैंक' को ध्यान रखने की भी मजबूरी होगी. आख़िर राजनीतिक हितों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता. मुझे आश्चर्य होगा अगर मानवाधिकार वाले इसमें न कूदें. अपने को मानवाधिकारवादी, बुद्धिजीवी और सेक्युलर साबित करने का इतना सुनहरा मौका ये लोग नहीं छोड़ने वाले.

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

आपने बहुत ही सही बात और बिलकुल सही मुद्दे पर अपनी बात रख्खी है। कहते है कि जिस देश का विपक्ष जिनता मजबूत होता है वहां पर लोकतंत्र उतना ही मजबूत होता है। लेकिन जो संकेत है कि "यह मानने के अच्छे भले कारण हैं कि वे सपा, बसपा, राजद और यहां तक की राजग के घटक झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेताओं को यह समझाने में सफल रहे कि कटौती प्रस्ताव का विरोध करने की स्थिति में उनके खिलाफ चल रहे मामलों में केंद्रीय जांच ब्यूरो नरम रवैया अपनाएगा।" और "कटौती प्रस्ताव के पहले बसपा महंगाई के लिए केंद्र सरकार को न केवल जिम्मेदार बताती थी, बल्कि केंद्रीय मंत्रियों का त्यागपत्र भी चाहती थी, लेकिन उसने केंद्र सरकार के समर्थन का निर्णय लिया और यह खोखला तर्क दिया कि ऐसा न करने से कथित सांप्रदायिक दलों को लाभ मिलेगा। असलियत यह है कि इसके पीछे सीबीआई की भूमिका रही। कटौती प्रस्ताव के पहले सीबीआई ने यह जो दलील दी कि वह मायावती के विरुद्ध आय से अधिक मामले पर नए सिरे से विचार करने के लिए तैयार है" ऐसे में चोर-चोर मौसेरे भाई कि कहावत चरितार्थ होती ही दिख रही है और यह हमारे भारत के लिए अच्छे संकेत नहीं है।

के द्वारा:

आपने सही लिखा सर जी, कांग्रेस वायदा कारोबार पर नियंत्रण नहीं कर पा रही है, ऊपर से महंगाई के बावजूद ठहाके लगाकर गरीब जनता का मजाक उड़ा रही है, सीबीआई का डर दिखा कर मायावती,मुलायम.लालू व सीबू सोरेन जैसो को डरा कर संसद में अपने अमीरों के हित के प्रस्तावों को जबरन पास करा रही है, ये सारे नेता कांग्रेस के सामने सीबीआई के डर से नत मस्तक है, जनता मरे जाये भाड़ में हम क्यों जेल जाये, जिसकी सत्ता उसे नमस्कार करो झूठे आन्दोलन कर जनता का बेवकूप बनाओ,सोनिया राहुल के साथ शाम की चाय पीओ, महंगाई बढती है तो बढ़ने दो, बस सीबीआई हमारे आय से अधिक संपत्ति के मामले दबा कर रखे, वह तभी होगा जब कांग्रेस को नमस्कार करोगे. आपके बेहतर लेखन के लिए बधाई

के द्वारा: डॉ दीपक धामा डॉ दीपक धामा

आरर्णीय संपादक जी, आंतरिक सुरक्षा पर राजनीति, पर आपका चिंतन मनन..साथर्कता से परिपूर्ण है। लेकिन यह कोई नया मामला नहीं है। जब देश में निस्वार्थ भाव वाला राजनीतिक स्वरूप हुआ करता था, तब भी नक्कसलवाद मौजूद था..अब तो सब कुछ उलटा पुलटा हो चुका है, तो ऐसे में नक्कसल वाद का रूप अति विकृत हो जाना कोई आश्चर्यजनक नहीं है। जब तक अमीरी गरीबी का अंतर द्वंद गतिमान रहेगा, तब तक यह समस्या का जीवनचक्र चलता रहेगा। बल पूर्वक इससे मुक्ति या अंकुश की कल्पना सूरज को दीया दिखाने वाली कहावत को चरितार्थ करती है। क्योकि इस राह में जो लोग भी हथियार उठाते है, उनमें एक जुनून होता है..कुछ कर दिखाने का। उनके लिए जीवन को कुर्बान करना एक मामूली सी बात होती है। कमजोर और निहत्थों पर अपने हथियारों की धार तेज करते रहने से ऐसे लोगों में संवेदना की धार मर जाती है। नतीजन इन लोगों में कसाईवाली मानसिकता बलवती हो जाती है। हमारे देश में जितने भी तरह के सुरक्षा बल है..तकरीबन उन सभी लोगों के जवान, कतर्व्यनिष्ठा के बोध का अभाव, हरामखोरी, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और कामचोरी की आदतन के चलते..जीवन को लेकर सहमे रहते है..ऐसे में हमारे सुरक्षा बल के लोग हमेशा मुठभेड़ के वक्त अपने प्रतिद्वंदी पर िकया गया आक्रमण हमेशा रक्षात्मक होता है। जबकि नक्कसवादी और इन जैसे जेहादी..मुजाहिदीन..खाड़कू आदि जान की बाजी के साथ बड़े ही खुंखार तरीके से करते है हमला। बड़ी आसान सी बात है..जो मार खाना जानता है वही किसी को भी आसानी से मार सकता है। ऐसे लोगों के पास अत्याधुनिक हथियार भी है. जबकि हमारे सुरक्षाबलों के अधिकांश जवानों के पास आज भी बाबा आदम जमाने के अस्त्रशस्त्र है। कुछ जो नए हथियार है भी तो उनकी खरीद में भ्रष्टाचार की मिलावट रहती है।.जिसका अक्सर परिणाम यह होता है कि इनमें से अधिकांश अस्त्र मौके पर अपनी क्षमता का पूर्ण और सटीक प्रदर्शन नहीं कर पाते है। (अक्सर गोली दगती नहीं है या बंदूक की नली में फंस जाती है..अथवा बारूद नकली होता है) इसका भय भी हमारे बल के जवानो में रहता है। जबकि आतताइयों के हथियार बड़े है सटीक परिणामदायक होते है। हमारे देश के बुद्धिजीबी वर्ग का भगवान भला करे..ये लोग आज तक किसी का भला नहीं कर पाए है। छपास के जरिए हमेशा प्रकाश में रहने की मनोवृत्ति इनको कुर्तक बनाए हुए है। इनको कुत्ते की टेढ़ी दुम कहना उस प्राणी की स्वामीभक्ति का अपमान करना है। मेरी नजर में ये बुद्धिजीवी लोग छिपकली की वो दुम है..जो हलका सा खतरा भांपकर अपने मूल से अलग होने में जरा भी देर नहीं लगाती है। और धोखा देने की नीयत से विस्थापित स्थल पर तड़फने का नाटक करती है। वोट की राजनीति देश को बर्बादी के कगार ले आई है। लेकिन वो दिन अब दूर नहीं है..जब इन लोगों का कुर्ता पायजामा जनता सरे राह फाड़ेगी और पत्थर मारेगी।

के द्वारा:

सर, आपने अत्यंत ज्वलंत समस्या को उठाया है। इस पर राष्ट्रव्यापी बहस और फौरी कदम उठाए जाने की जरूरत है। सचमुच नक्सलियों का दुस्साहस बढ़ता जा रहा है। पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में 24 जवानों की बेरहमी से हत्या के दो दिन बाद ही बिहार के जमुई जिले में एक गांव में तांडव मचाकर नक्सलियों ने हमारी शासन व्यवस्था को खुली चुनौती दी है। एक तरफ हम दुनिया की बड़ी महाशक्ति बनने का दावा करते हैं, दूसरी ओर हमारे घर में ही मौजूद मुट्ठी भर माओवादी हमें बार-बार हमारी ताकत का अहसास करा रहे हैं। विभिन्न राज्यों में नक्सलियों की बढ़ती ताकत और उनके पास आधुनिक हथियारों का होना इस बात की ओर साफ इशारा कर रहे हैं कि उनकी सांठगांठ कुछ ऐसी ताकतों के साथ हो चुकी है, जो भारत को अस्थिर करना चाहती हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत में पिछले तीन वर्षों में आतंकी हमलों में कुल 436 लोग मारे गए हैं, जबकि नक्सली हमलों में मारे गए लोगों की संख्या 1,500 से ज्यादा है। ऐसी स्थिति में अब भी नक्सलियों के हिंसा छोड़ने और वार्ता के माध्यम से समस्या का समाधान सोचने की बात बेमानी ही होगी। नक्सलियों ने तो माओ से एक ही बात सीखी है कि ताकत बंदूक की नली से आती है। अब समय रहते उन्हें ईंट का जवाब पत्थर से नहीं दिया गया तो देर हो जाएगी। नक्सली समस्या ने भारत में संसदीय लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा कर दिया है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि निहित स्वार्थ में कुछ बड़े नेता अकसर वामपंथियों के सुर में सुर मिलाते हुए नक्सलियों के लिए ढाल बनकर खड़े हो जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार के साथ-साथ रेल मंत्री ममता बनर्जी तो झारखंड में खुद मुख्यमंत्री शिबू सोरेन नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं चाहते। यह समय की मांग है कि सरकारों के साथ-साथ सभी दलों के नेता, जिनमें थोड़ी भी देशभक्ति बची है, अपने निहित स्वार्थों से ऊपर उठकर इस समस्या का हल तलाशें। htpp://ranjanrajan.jagranjunction.com

के द्वारा: रंजन राजन रंजन राजन

आदरणीर्य संपादक जी, नमस्कार, इस शुरूआत ने जागरण समूह की यह कहावत कि यह बदलते जमाने का अखबार है को चरितार्थ करती है। नि-संदेह यह बदलाव हमलोगो को जहां नए पाठकों को सीधे जोड़ेगा, वही पर निरंतर जारी यह नवीनता हमारी जीवंतता को भी उजागर कर रही है। सच यह कि सिर्फ जीवित आत्मा ही यह नारा बुलंद कर सकती है कि हम पत्र ही नही मित्र भी है। बदलाव की यह पहल नित नए कीर्तिमान स्थापित करती जा रही है। इसके लिए आपकी कुछ नए बने रहने की बलवती चाहत को साधुवाद देता हुं। यह सोच इस समूह को गतिमान बनाए रखे हुए है। हर गतिमान चीज में जीवन का संचार रहता है। और इसी के चलते ही हमलोग अपने पाठकों से हर बार नए रूप में मिलते रहते है। मेरा अनुरोध है कि बदलाव की मुहिम में अपने पाठको से की गई पऱतिबद्धता का भी ध्यान रखे। क्योकि हमलोगो के अपने कुछ पारंपरिक पाठकगण आर्थक रूप से इतने समर्थ नहीं है कि वो लोग वर्तमान सूचना कऱांति में हुए परिर्वतन का लाभ उठा सके। इस तरह से कहीं अनजाने में ही इनको अपने से दूर न कर बैठे। कुछ भी हो यह बदलाव मेरे लिए वरदान साबित हुआ है, क्योकि इस माध्यम के बगैर मैं कभी भी आपसे सीधे संवाद स्थापित नहीं कर पाता। रूबरब होने का यह नया अहसास मुझे रोमांचित कर रहा है। मैं अपने को बड़ ही खुशनसीब मान रहा हू। कम से कम अब मैं गर्व से कह सकूंगा कि संपादक जी से मेरी सीधी बात चीत है। इस नई पहल को सहर्ष सुविकारते हुए आपको लाख लाख बधाई देता हू। अर्ज है एक गीत- रूप तेरा ऐसा दर्पण में न समाए..खुशबू तेरे मन की, मधुवन में न समाए..ओ ..मुझे खुशी मिली इतनी..कि मन में समाए, पलक बंद कर लू ...कहीं...छलक ही न जाए.

के द्वारा:

आदरणीय सर आपका यह कहना कि (ध्यान रहे कि जो सरकार अपने नागरिकों की रक्षा के लिए तत्परता नहीं दिखाती वह विश्व में कहीं सम्मान नहीं पाती।) बिल्‍कुल सही है। देश के नागरिकों की रक्षा सरकार का कर्तव्‍य है। जनता के वोटों की जिस शक्ति के बूते वह दिल्‍ली तक पहुंचे हैं और जनता की रहनुमाई करने का दम्‍भ भरते हैं उस पर खरा उतरना भी उनका दायित्‍व है। लेकिन दायित्‍वों की अनदेखी के मामले में लगभग हर दल की सरकार ने अपना परचम ही लहराया है। विदेश में हुए हमलों की बात तो दूर यहां के जनप्रतिनिधि तो देश में ही अपने नागरिकों की सुरक्षा का दायित्‍व स्‍वीकारने में अक्षम साबित होते हैं। रियाज जी ने अपने ब्‍लाग में रेल राज्‍य मंत्री की प्रेस कांफ्रेस का जिक्र किया है जिसमें मंत्री जी ने कहा कि 63 हजार किलोमीटर रेलवे लाइनें और 10 हजार ट्रेनें। अगर एक-दो एक्सीडेंट हो जाते हैं तो चलता है….।’ 28 जनवरी 2009 रेल राज्यमंत्री केएच मुनियप्पा लखनउ में प्रेस कांफ्रेस के दौरान दायित्‍वों से मुंह मोड लेने की स्थिति देश में ही खडी हो चुकी है ऐसे में विदेशों में हो रहे हमलों को लेकर आखिर ये छात्रों को यही सलाह देंगे कि आप वहां जाएं ही न । न आप जाएंगे न हमले होंगे। कायरतापूर्ण निर्णयों की वजह से ही देश की छीछालेदर हो रही है।

के द्वारा: Suneel Pathak Jagran Faizabad Suneel Pathak Jagran Faizabad

काश... भारत सरकार में इतनी इच्छाशक्ति होती। यदि सरकार में संवेदनशीलता है तो उसे आपके अंतिम वाक्य पर ज़रूर गौर करना चाहिए। ....ध्यान रहे कि जो सरकार अपने नागरिकों की रक्षा के लिए तत्परता नहीं दिखाती वह विश्व में कहीं सम्मान नहीं पाती, यह बात सोलह आने सच है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण अमेरिका है जो दुनिया भर के देशों में अपने नागरिकों की रक्षा को हमेशा तत्पर रहता है और खुद आस्ट्रेलिया ही इस तत्परता में कहां पीछे है। मुझे आज भी याद है कि इंटरनेशनल आतंकी मौलाना मसूद अज़हर को तिहाड़ जेल से रिहा कराने के वास्ते अपहृत दो आस्ट्रेलियाई और तीन ब्रिटिश नागरिकों को 2 नवंबर 1994 को सहारनपुर में आतंकियों के कब्जे से सकुशल छुड़ाया गया था। इस आपरेशन में साहिबाबाद (ग़ाज़ियाबाद) के इंस्पेक्टर ध्रुव लाल यादव और सिपाही राजेश यादव शहीद हुए थे। इस पूरी कार्रवाई का आब्जर्वेशन तब पीएमओ कर रहा था जो आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के दबाव का ही तो परिणाम था। वैसे भारतीय छात्रों पर हमले खुद आस्ट्रेलिया के लिए भी घातक हैं क्योंकि आस्ट्रेलियाई शिक्षा उद्योग के लिए ये बुरा संकेत हैं। आस्ट्रेलिया में अध्ययन के लिए भारतीयों की ओर से छात्र वीजा के लिए किए जाने वाले आवेदनों में भारी कमी आई है। इस गिरावट को हमलों के संदर्भ में ही देखा जा रहा है। आव्रजन विभाग द्वारा पिछले साल की जुलाई-अक्टूबर अवधि के लिए जुटाए गए आंकड़ों से पता चलता है कि छात्र वीजा के लिए भारतीयों की ओर से दिए जाने वाले आवेदनों में पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 46 फीसदी की गिरावट हुई है। सिडनी मॉर्निग हेराल्ड अखबार ने तो यहां तक लिखा है कि आवेदनों की संख्या में यह भारी गिरावट देश के 17 अरब डालर के अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा उद्योग के लिए बुरा संकेत है। पिछले 12 महीनों में आस्ट्रेलिया में अध्ययनरत भारतीय छात्रों की संख्या करीब 115,000 रही। जाहिर है, भारतीय छात्र इस उद्योग की आय का बड़ा जरिया हैं। भारतीयों पर हमलों से दूसरे अंतर्राष्ट्रीय छात्रों में भी असुरक्षा की भावना घर कर गई है। भारतीय छात्रों की संख्या में कमी से व्यावसायिक पाठ्यक्रमों पर व्यापक नकारात्मक असर पड़ेगा। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और दूसरे देशों की इस मसले पर खामोशी शायद इसीलिए है कि जब भारत सरकार ही दो टूक प्रतिक्रिया या दबाव नहीं बना पाई तो बाकियों को क्या मतलब।

के द्वारा: Riyaz Hashmi, Jagran Riyaz Hashmi, Jagran




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